बस्तर / पत्रकार.. दोधारी तलवार..

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016




लगातार प्रेशर बम, लैंड माइन बिछे हुए इलाकों में काम कर रहे बस्तर  के  पत्रकार अब निरंतर भय के माहौल में काम कर रहे हैं...  हालात यह हैं  कि नक्सल प्रभावित इलाकों में पत्रकार दोधारी तलवार पर चल रहे है. पत्रकारों को यहां कोई “नक्सली एजेंट” समझता है तो कोई “पुलिस एजेंट”,.वे सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच पिस रहे हैं अब चूंकि क्योंकि कलम बंदूक से ज्यादा ताकतवर होती है.  लिहाजा इलाके के दमदार लोगों ने क़ानून को ही नही कलम को भी बंधक सा बना लिया है। अकबर इलाहाबादी ने कहा है कि तीर  निकालो ना तलवार निकालो गर मुक़ाबिल  हो तोप तो अखबार निकालो मगर बस्तर में  रहा है ऐसे हालात हैं कि पत्रकार को ही बाहर निकलो।शायद दुनिया से बाहर।
बस्तर  के  पत्रकार के लिए चित्र परिणाम मगर जुझारू पत्रकार डटे हैं यह मानकर कि सत्य परेशान तो हो सकता है ..पराजित नही|  पत्रकार एजिटेटेड हैं और अब सड़कों पर भी हैं| पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग करते हुए पत्रकार आंदोलन कर रहे हैंउनको दबाने वालो की यह गलतफहमी है कि कलम हमेशा के लिए दबेगी| एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में करीब 300 पत्रकार काम कर रहे हैं.अब यह राष्ट्रीय सुर्ख़ियों का मुदा है क्योंकि पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति छत्तीसगढ़ ने बस्तर सहित पूरे प्रदेश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के खिलाफ और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर में प्रदर्शन किया।
 हाल में दंतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह को भी आईटी एक्ट के एक मामले में जेल भेज दिया गया । बीजापुर के ही पत्रकार कमलेश पैकरा को पुलिस ने नक्सली मामले में गिरफ्तार किया था। कुछ दिनों पहले दरभा के पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग को भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। इसके अलावा एक अन्य मामले में जगदलपुर के पत्रकार अनिमेश पाल को भी जेल जाना पड़ा था। प्रभात के खिलाफ़ स्कूल परिसर में जबरन घुसने, शिक्षकों और स्टाफ से हाथापाई करने और पैसे मांगने के कथित आरोप में एफआईआर पिछले साल हुई थी। अधिवक्ता महेंद्र दुबे के मुताबिक  प्रभात सिंह के खिलाफ की गयी लिखित शिकायत और एफआईआर के तथ्यों से प्रभात सिंह के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67, 67A और आईपीसी की धारा 292 का अपराध बनता ही नहीं है इसके बावजूद उसे बिना किसी कानून सम्मत कारण के गिरफ्तार किया जाना पुलिस की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
मुख्य्मंत्री डा रमन सिंह  पत्रकार मामले में एक कमेटी बनने का एलान कर चुके हैं। कमेटी राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर विशेष तौर पर गठित  की .
छत्तीसगढ़ में दो पत्रकारों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ बस्तर -जगदलपुर में पत्रकारों के शुरू हुए आंदोलन के पहले दिन राज्य सरकार ने एलान कर दिया कि राज्य में पत्रकारों की समस्याओं को लेकर एक विशेष समिति गठित  की जाएगी। किसी भी पत्रकार की गिरफ्तारी के संबंध में 72 घण्टे के भीतर समिति को मिलने वाली शिकायत की जांच सरकार के पास उपलब्ध ठोस तथ्यों के आधार पर की जाएगी और आवश्यक हुआ तो संबंधित पत्रकार को राहत देने के लिए उपयुक्त निर्णय लिया जाएगा। बस्तर में दो पत्रकारों को कथित तौर पर नक्सली समर्थक बता कर गिरफ्तार किए जाने के विरोध में बस्तर के पत्रकार लामबंद हुए और धरना दिया गया। ये मुद्दा राज्य की विधानसभा में भी उठा ।

मुख्यमंत्री डा रमन सिंह ने रायपुर से टेलीफोन पर आंदोलित पत्रकारों के प्रतिनिधियों को यह भी आश्वासन दिया कि उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार सजग है और इसके लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएंगे।
डा. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां की माटी पत्रकारिता एवं साहित्य की उर्वरा भूमि रही है। स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। रमन सिंह ने बस्तर के अधिकारियों को निर्देश दिये हैं कि पत्रकारों को भरोसे में लेकर काम करें.
  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर परिपत्र  में कहा गया है कि प्रदेश में समय-समय पर पत्रकारों के विरूद्ध आपारिधक प्रकरण दर्ज करने या गिरफ्तार करने की स्थिति में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मुददे पर सवाल उठते हैं। शासन को कई बार इस प्रकार की शिकायतें भी प्राप्त होती हैं कि किसी पत्रकार पर पुलिस कर्मियों द्वारा ज्यादती की गयी है, या उनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है।

पत्रकारों के निंमित्त जारी परिपत्र में दी गयी व्यवस्था इस प्रकार होगी -

(1) पत्रकारों पर ज्यादतियां होने की शिकायतों को संचालक जनसम्पर्क विभाग एकत्रित कर पुलिस मुख्यालय में कार्यरत उप पुलिस महानिरीक्षक (शिकायत) को भेजेंगे। संचालक जनसम्पर्क से प्राप्त प्रकरणों में पुलिस मुख्यालय द्वारा आवश्यक कार्रवाई किए जाने के बाद इसकी सूचना संचालक जनसम्पर्क को और प्रतिलिखि गृह विभाग को दी जाएगी।

(2) जहां तक पत्रकारों के विरूद्ध कोई प्रकरण कायम किए जाने का प्रश्न है, इस संबंध में राज्य शासन ने यह निर्णय लिया है कि यदि किसी भी (चाहे वह अभी स्वीकृत पत्र प्रतिनिधि हो या न हो) के विरूद्ध कोई प्ररकण कायम किया जाता है, तो उन प्रकरणों में चालान किए जाने के पहले उन पर उपलब्ध साक्ष्य की समीक्षा संबंधित पुलिस अधीक्षक और क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षक कर लें और स्वयं को आश्वस्त कर लें कि कोई भी प्रकरण दुर्भावनावश या तकनीकी किस्म के स्थापित नहीं किए जाए। यदि उप महानिरीक्षक के मत में यह पाया जाए कि कोई प्रकरण दुर्भावनावश कायम किया गया है, तो तत्काल उनको समाप्त करने के निर्देश दिए जाएं और संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध कार्रवाई की जाए। इस कंडिका में यह भी कहा गया है कि बगैर समीक्षा किए हुए प्रकरणों का चालान न्यायालय में प्रस्तुत न किया जाए। प्रत्येक तिमाही में क्षेत्रीय उप पुलिस महानिरीक्षण इस प्रकार के प्रकरणों की समीक्षा करेंगे और वे पुलिस महानिदेशक को सूचना भेजेंगे। पुलिस महानिदेशक से यह सूचना गृह विभाग को भेजी जाएगी।

(3) यह व्यवस्था यथावत जारी रहेगी। इसके अन्तर्गत उप पुलिस महानिरीक्षक के स्थान पर अब पुलिस महानिरीक्षक (रेंज) कार्रवाई करेंगे।

(4) उपरोक्त व्यवस्था के अतिरिक्त शासन स्तर पर एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति का भी गठन किया गया है, जो पत्रकारों और शासन के बीच आपराधिक प्रकरणों और संबंधित विषयों में आवश्यक समन्वय स्थापित करने की कार्रवाई करेगी। समन्वय समिति के अध्यक्ष सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव होंगे। समिति में गृह (पुलिस) विभाग के सचिव, पुलिस मुख्यालय की अपराध अनुसंधान शाखा के प्रभारी अधिकारी और शासन द्वारा नामांकित दो वरिष्ठ पत्रकार सदस्य होंगे। समन्वय समिति में जनसम्पर्क विभाग के संचालक सदस्य सचिव होंगे। समिति द्वारा संबंधित रेंज पुलिस महानिरीक्षक को भी आवश्यकतानुसार आमंत्रित किया जा सकता है।

(5) उपरोक्त समन्वय समिति के संदर्भ की शर्ते इस प्रकार होंगी - परिपत्र की कंडिका-2 में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार यदि कार्रवाई से संतुष्टि नहीं होती है, तो उन प्रकरणों में उच्च स्तरीय समन्वय समिति द्वारा विचार किया जाएगा। समिति द्वारा विचारण से संबंधित मामले के चयन का अधिकार संचालक जनसम्पर्क के पास रहेगा।  पत्रकार के रूप मंे किए गए किसी कार्य के कारण पत्रकारो के विरूद्ध दर्ज आपराधिक प्रकरणों के संबंध में यह उच्च स्तरीय समन्वय समिति पुलिस और पत्रकारों के बीच समन्वयक की भूमिका का निर्वहन करेगी। समिति पुलिस और पत्रकारों की ओर से आवश्यक सूचना और जानकारियों को आदान-प्रदान करेगी। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करने और प्रकरण से जुड़े पक्षों को बुलाने के लिए समिति आवश्यक निर्देश भी जारी करेगी।

परिपत्र की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक और सामान्य प्रशासन विभाग तथा जनसम्पर्क विभाग के सचिवों सहित समस्त संभागीय कमिश्नरों, कलेक्टर और जिला दण्डाधिकारियों, रेंज पुलिस महानिरीक्षकों और सभी पुलिस अधीक्षकों को भी भेजी गयी है।
छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए बनी बीमा एवं सम्मान निधि (पेंशन योजना) की तकनीकी खामियों को दूर करने एवं वेतन बोर्ड की सिफारिशों को प्रदेश स्तर पर लागू करवाने की मांग को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल  ने राज्यपाल बलरामजी दास टंडन से मिलकर ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन में बताया गया कि सम्मान निधि (पेंशन योजना) में सेवानिवृत्त पत्रकार इसलिए पात्र नहीं माने जा रहे है क्योंकि विभिन्न समाचार पत्रों में काम करने के बाद भी जनसंपर्क विभाग में उनकी अधिमान्यता नहीं रही है। 

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भूले -बिसरे "महिपाल भंडारी"

शुक्रवार, 17 जून 2016

आजकल फैंटेसी फ़िल्में बनती ही नहीं और टाकीज पर मॉल्स बन गए हैं। थिएटर जा कर सामूहिक फिल्मदर्शन का सामजिक सुकून टीवी जैसे घरघुस्सू और सेलफोन जैसे घनघोर सेल्फिश बनाने वाले माध्यम ने छीन लिया है।
  भूले बिसरे बेजोड़ कलाकार "महिपाल भंडारी" ने लंबा अरसा पौराणिक और तिलस्मी फिल्मो को जिया। राजकपूर दिलीप और देवानंद जैसे दिग्गजों के रहते अपनी अलग पहचान बनाई।
महिपाल का जन्म जोधपुर में 1919 को ओसवाल जैन परिवार में हुआ था। महज़ 6 साल के थे कि उनकी मां गुज़र गयीं। नवरंग 1959, संपूर्ण रामायण 1961, बजरंग बाली 1956 और पारसमणि 1963 , लक्ष्मीनारायण’ 1951 और ‘अलादीन और जादुई चिराग़’ (1952) जैसी अनेक फिल्मे उनके खाते में हैं। 40 साल -130 फिल्मे ... नारद की भूमिका में भी याद किए जाते रहे। 

15 मई 2005 को 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।अभिनेता महिपाल ज्यादातर फैंटेसी  फिल्मों के लिए प्रसिद्द थे
बहुत ही कम लोग जानते हैं कि लता का पहला गीत प्रख्यात अभिनेता महीपाल ने ही लिखा था। अदालत में ज्यादातर गीत महीपाल ने ही लिखे, महिपाल ने माली, आपकी सेवा में, अदालत (पुरानी), मेरे लाल इत्यादि फिल्मों के गीत भी लिखे थे।  फिल्म आपकी सेवा में लता मंगेशकर ने अपने पार्श्व गायन की शुरुआत की थी।महिपाल चन्द भण्डारी ने अपने रिटायरमेंट के बाद कविताएं भी लिखी थी। उनका एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ था......उनको हार्दिक श्रद्धांजलि

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पवन दीवान का चले जाना

बुधवार, 2 मार्च 2016

 पवन नहीं ये आंधी है
 छत्तीसगढ़ का गांधी है  .....
यह छात्रों किसानो बलिदानियों का देश है..
राक्षसों के चेहरे पर स्वर्ण मृग का वेश है ..
पाप की लंका जला दो राम का आदेश है ..
कौरवों को भून डालो कृष्ण का सन्देश है ..

इन आग उगलती पंक्तियों के रचियता जनकवि-संत पूर्व सांसद पवन दीवान का चले जाना बहुत अखरेगा।
छत्तीसगढ़ी  कविताओं के माध्यम से जन-चेतना की अलख जगाने वाले दीवान का जन्म 1 -1 -1945 को छत्तीसगढ़ के राजिम के पास स्थित ग्राम किरवई के प्रतिष्ठित ब्राम्हण परिवार में हुआ था।  प्रारंभिक शिक्षा गांव में तथा स्कूली शिक्षा फिंगेश्वर व उच्च शिक्षा रायपुर में हुई। आपने हिन्दी, संस्कृत एवं अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त् की। दीवान जी छात्र जीवन से ही साहित्य सृजन करने लगे थे। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में  कविताएं तो लिखने वाले  दीवान वक्तृत्व कौशल  से सरस भागवत कथा के प्रवचनकर्त्ता के रूप में भी गांव गांव में लोकप्रिय रहे हैं।  पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के लिये जन आंदोलन का भी आपने नेतृत्व किया है। कांग्रेस और भाजपा  में सक्रिय रहे । 
उनकी एक कविता में वे शोषकों को चेतावनी देते हुये कहते हैं -

घोर अंधेरा भाग रहा है, छत्तीसगढ़ अब जाग रहा है,
खौल रहा नदियों का पानी, खेतों में उग रही जवानी।
गूंगे जंगल बोल रहे हैं, पत्थर भी मुंह खोज रहे हैं,
धान कटोरा रखने वाले, अब बंदूकें तोल रहे हैं
  

..... 
छत्तीसगढ़ में सब कुछ है,
पर एक कमी स्वाभिमान की।
मुझसे सही नहीं जाती है,
ऐसी चुप्पी वर्तमान की।



उनके निधन से छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सांस्कृतिक रिक्तता बनी रहेगी।उन्हें वेंटिलेंटर पर रखा गया था। अपने बेलौस अंदाज और बेबाक ठहाकों के लिए जाने जाने वाले पवन दीवान को मस्तिष्काघात के कारन 4 दिन पहले अस्पताल में दाखिल कराया गया था मगर तबियत में कोई सुधार नहीं होने के कारण दीवान को बेहतर इलाज के लिए शनिवार को सुबह एयर एंबुलेंस से गुड़गांव के मेदंता अस्पताल में शिफ्ट किया गया मगर उनको बचाया नहीं जा सका। 
आपातकाल में सार्वजनिक मंचों से यह पंक्तियाँ सुनाने वाले छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय संत कवि और पूर्व सांसद पवन दीवान का निधन हो गया है। 

वे छ.ग.गौ सोवा आयोग अध्यक्ष भी रहे।  व्यक्तिगत तौर पर मैंने लम्बे अरसे में उनको जितना जाना और पाया वे बेहद सहृदय मददगार और अपने जीवन मूल्यों पर डटे रहने वाले इंसान थे और पूरा जीवन मस्तमौला की तरह जिए.. मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

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संसद हमले की 14वीं बरसी

शनिवार, 19 दिसंबर 2015



जगह वही...
हालात बदले हुए...
जब संसद भवन पर हमला  हुआ था मै उस घटना का मूक साक्षी रहा । 
13 दिसंबर 2001 की घटना को नई पीढ़ी के लोग शायद भूल गए हों। भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर इस तारीख को धमाकों और गोलियों से छलनी हुआ था, जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकवादी सफ़ेद कार में गृह मंत्रालय का स्टीकर लगाकर घुस आए थे मगर संसद की चौखट पर ही उनको नेस्तनाबूद कर दिया गया। 

अकस्मात हुई इस घटना को रोकने का काम किया वाच एंड वार्ड के शहीद जगदीश प्रसाद यादव- मातबर सिंह नेगी ने अपनी जान की बाजी लगा वायरलेस पे सन्देश दिया, गेट बंद कराए और खुद आतंकवादियों की गोलियां झेल गए।
फ़ौरन संसद के सुरक्षा स्टाफ ने मेन बिल्डिंग को चारों तरफ से बंद कर दिया।

13 दिसंबर 2001 की तारीख भी इतिहास में दर्ज हो जाने के लिए आई।
संसद पर हुए आतंकी हमलों  के मुख्य आरोपी मोहम्मद अफज़ल गुरु को 9 फ़रवरी 2013 को सुबह दिल्ली के तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया।


अत्याधुनिक हथियारों से लैस फिदायीन हमलावरों के साथ मुठभेड़ में 9 लोगों की मौत हो गई थी।
भारतीय लोकतंत्र को थर्रा देने वाली घटना में कई शहीद हुए जिनको नमन है। 
  

 (चित्र में वही गेट और फाइल फोटो )                                                      

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पूरा वृत्तांत यहां पढ़ें 

यहां सुन सकते हैं 
(youtube support by journalist Rk Gandhi)

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श्रद्धेय बबनजी के बिना

शनिवार, 21 नवंबर 2015


आदरणीय, संपादकों के संपादक, पत्रकारिता के पितृपुरुष, संस्कारवान कलम के धनी बबन प्रसाद मिश्र का नाम छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के लिए अनचीन्हा अंजाना नहीं है।  7 नवम्बर को वे दुनिया से रुखसत हो गए। अब स्मृतियाँ मुझे अस्सी के दशक  की ओर लगभग 32 साल पीछे खींच रही हैं जब 18 साल का एक युवा गांव से नया नया शहर में आया था। लिखने की कुछ तमीज पैदा हो गई थी और युगधर्म  में एक चिट्ठी क्या छपी युवा तो उछल कर सातवें आसमान पर पहुंच गया। जा पहुंचा युगधर्म के सिटी स्टेशन पंडरी रायपुर दफ्तर। यहां से शुरू,  रमेश शर्मा की पत्रकारिता यात्रा। मिले बबनजी।
सुदर्शन , सौम्य ,शांत ,शालीन। मै बहुत सा कुछ लिख कर उनको दे आया। वे इस रूप में मिले जैसे कोई पिता अपने पुत्र से मिलता है। अब तो रोज़ पंडरी की दौड़ लगने लगी। पत्रकार कैसे बनते हैं  यह नहीं मालूम था मगर इतना इल्हाम जरूर था कि  श्रद्धेय बबनजी की छत्रछाया मिल जाए तो कल्याण समझो। मै लिख लिख कर ले जाता वे आगे बढ़ा देते। कुछ छपता कुछ नही छपता। इस बीच देव कृपा से पाकेट मनी निकलने के लिए की जा रही एक दुकान की पार्ट टाइम नौकरी छूट गई और मै एक ब्रेक  क़ी तड़प या आगे आने की ललक या युगधर्म रास्ते से सुनहरे भविष्य की झलक पा कर छत पर कलम घिसता यदाकदा  मुंह लटकाए जब तब पंडरी में बबनजी के पांव छूने पहुंच जाता। नैया अब आपके हाथ। वो एक दौर था। टर्निंग पाईंट। किसी गलत सलत मौके ने मुझे लपक लिया होता या आगे आने की मजबूरी में कोई और लाईन पकड़ लेता तो आज इस मुकाम पर नही आता जिसमे कुछ नही तो एक आत्म संतोष तो है।

बबनजी ने खूब लिखवाया।  गिरीश पंकजजी और किशोर दिवसेजी के मातहत चलने वाले कालमों में खूब कलम घिसवाई और जब ये देखपरख लिया कि बन्दे में कमिटमेंट है तो मेरी जरूरतों को शायद चेहरे पर पढ़ कर एक दिन मुझे सिटी रिपोर्टर नियुक्त कर दिया और तनख्वाह  250 रूपये जिसे अगले तीन महीने में अपॉइंटमेंट लैटर के साथ 900 रूपये का पैकेज कर दिया ।
उस ज़माने में यह बड़ी रकम थी जब मकान किराया होता था 80 रूपये। यह एक एहसान था उनका मुझ पर। मै कालेज में एडमिशन भी नहीं ले पाया था मगर लिक्खाडी में खुद को पता नही क्या समझता था।  आत्मविश्वास का अतिरेक या वयः जनित हार्मोनल चेंजेस से पैदा होने वाला दुस्साहस। एक मैट्रिक पास लड़के को रिपोर्टर बनाते विरोध भी होना स्वाभाविक था मगर उस दौर के सीनियर उदारमना तो थे , लिटरेट होने और शिक्षित होने का फर्क भी समझते थे। अविनाश देशपांडे क्राइम चीफ हुआ करते थे। मै क्राइम रिपोर्टर। जीजाजी ने एक बाइक दे दी, मै तो अब
शहर में यूँ अकड़ता घूमता मानो खबर भी मुझे लिखनी है और दुष्टों को सजा भी खुद सुनानी है। एक दिन मैंने  चौकीदार की मौत पर 8  कालम का हेडिंग  दे कर समाचार तान दिया। तत्कालीन एसपी रुस्तम सिंह परेशान। खबर में पुलिस  किरकिरी हुई थी क्योंकि पुलिस की मजम्मत करती खबर का हेडिंग था - पुरुषोत्तम  के हत्यारों को जमीन खा गयी या आसमान निगल गया.. शिकायत भीतर और बाहर दोनों जगह से हुई मगर बबनजी ने एक शब्द नही कहा। उलटे शाबासी दी। एनकरेज किया।

मुझे याद है तब माली हालत ठीक नही थी लिहाजा अखबार बस जैसे तैसे निकलता था मगर सब सहकर्मी उत्साह से लबरेज रहते थे।  बबनजी यदा कदा जरूर टोकते कि  पैसे -वैसे नही हैं तो उनसे ले लूँ। तनख्वाह आती रहेगी।  उनके घर भी जाना होता जहां सभी सदस्य ख़ास कर आंटीजी (श्रीमती मिश्र) कुछ खाए -पिए बिन जाने नही देती थीं।
तब कई मौकों पर बबनजी का राष्ट्र प्रेम , कलम की शुचिता , अडिग साहस, आग उगलते अग्रलेख  सामने आते। आगे दो सालों में प्रावीण्य सूची में पत्रकारिता का कोर्स और बबनजी समेत गिरीशजी इत्यादि की प्रेरणा से 16 साल तक दिल्ली की यात्रा होनी लिखी थी। रायपुर छूट गया,  युगधर्म यादो से बावस्ता हुआ और एक दिन बंद भी हो गया लेकिन बबनजी से प्रायः मुलाकात होती रही और स्नेह बराबर मिलता रहा। दिल्ली में फोन करके मिलने बुला लेते। खोज खबर लेते ,नसीहत मिलती। उनका जाना ऐसा लगा जैसे अपने ही परिवार से किसी सरपरस्त का जाना हो। कभी उनको क्रोधित हो कर अनापशनाप बोलते नही सुना। व्यक्तित्व की तरह उनका लेखन भी शालीन रहा। मै उनकी स्मृतियों को नमन कर चाहूंगा कि अगला जन्म भी पत्रकार का ही मिले और शुरुआत में ही बबनजी  की सरपरस्ती हासिल हो।   सादर प्रणाम। 

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दमदार अभिनेता सईद जाफ़री

सोमवार, 16 नवंबर 2015

फ़िल्मों और थिएटर के जाने-माने अभिनेता सईद जाफ़री (86) नहीं रहे यह खबर उनकी भांजी शाहीन के हवाले से आई है। याद करें राम तेरी गंगा मैली के मौसाजी या फिर हिना के कबीला सरदार। सईद साब अपने स्तरीय और प्रभावशाली अभिनय के लिए जाने जाते थे।
गांधी, मासूम, शतरंज के खिलाड़ी, चश्मे बद्दूर इत्यादि उनकी यादगार फिल्मे रही।
दिल, किशन कन्हैया, घर हो तो ऐसा, राजा की आएगी बारात, मोहब्बत, आंटी नंबर वन कमर्शियल फिल्मे भी की मगर फूहड़ भूमिकाओं से बचे रहे।
शाहीन अग्रवाल ने यह दु:खद खबर फेसबुक पर जारी की। उन्होंने लिखा कि आज जाफरी की एक पीढ़ी बिदा हो गई। शाहीन ने फेसबुक पेज लिखा, 'आज जाफरी परिवार में एक युग का अंत हो गया। सईद जाफरी अपने बहन और भाई के पास पहुंच स्‍वर्ग में पहुंच गए हैं।'
दमदार अभिनेता को सादर श्रद्धांजलि।

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सूखाग्रस्त छत्तीसगढ़

बुधवार, 16 सितंबर 2015


शुक्र है पिछले 24 घंटे से छत्तीसगढ़ में अनवरत वर्षा हो रही है मगर सूखी फसल अब हरी होने से रही। इस साल भयावह सूखे की पुष्टि हो गई है। 27 में से 20 जिले सूखे की चपेट में हैं। राज्य सरकार ने कुल 150 में से 93 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है।किसान अपनी फसल मवेशयिों को चराने पर मजबूर हो चुके हैं। कोई सोचे कि हमें क्या, हम किसान हैं क्या ? तो तैयार रहिए चावल की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए क्योंकि धान उत्पादक राज्यों में कमोबेश यही हाल बदहाल है। जिसे आगे चल कर बेलगाम मुनाफे की हवस में जमाखोर असहनीय बना देंगे।
राजधानी रायपुर समेत महासमुंद, राजनांदगांव, कांकेर ,धमतरी इत्यादि जिलों में अकाल की काली छाया पसर चुकी है और बारिश 50 फीसद कम हुई है लिहाजा फिलहाल खेतों में फसल सूख गयी है। 
बस्तर के कई इलाके 1975 के बाद सबसे बड़े सूखे का सामना कर रहे हैं। 
आंकड़ों के मुताबिक राज्य में हर साल औसतन 1200 मिमी बारिश होती है मगर इस साल मॉनसून औसत से काफी नीचे लगभग 800 मिमी रहा है। अंदेशा है कि अगर जाते मानसून में अगले 15 दिन में भारी बारिश नहीं हुई तो कई इलाकों में सूखे के हालात और बदतर हो सकते हैं। 
कई इलाकों में किसान अपनी फसल मवेशयिों को चराने पर मजबूर हो चुके हैं। सितम्बर में अप्रैल जैसी गर्मी पड़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने मंत्रिपरिषद की बैठक में व्यापक विचार-विमर्श के बाद राज्य के 20 जिलों की 93 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित करने का प्रस्ताव भारत सरकार को भी भेजने के निर्णय के साथ-साथ इन तहसीलों में ग्रामीणों के लिए युद्धस्तर पर रोजगारमूलक कार्य खोलने का भी निर्णय लिया।  गंगरेल बांध के गेट खोल दिए गए।  किसानों का कहना है कि यदि बारिश नहीं हुई तो सूदखोरों से त्रस्त हो पलायन करना पड़ेगा

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